3 best intersting stories in hindi – तीन मजेदार कहानियाँ

दोस्तों क्या आपको भी कहानियां पसंद है, कहानियां किसे पसंद नहीं होती है, कहानियां तो एक ऐसी कड़ी है जो हमें हमारे बचपन से जोड़ कर रखती हैं।
अगर यह कहानियां ना हो तो इसके बिना बचपन की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। आज की हमारी डिजिटल युग में बच्चे भी डिजिटल होते जा रहे हैं, इसलिए अब आपके सामने प्रस्तुत है कुछ ऐसी कहानियां जो बच्चों को ज्ञान तो देंगी इसके साथ ही उनका मनोरंजन भी करेंगे।

पीठ पर सैर (majedar kahaniya)

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एक दिन महाराज कृष्णदेव राय की अगूठी का बहुमून्य हीरा महल में कही खो गया। महाराज बहुत परेशान हुए। उन्होने तुरन्त महल के सेवको और सैनिको को हीरा खोजने का ओदेश दिया। सैनिक-सेवक महल में हीरा तलाशने में जुट गए। मगर हीरा न मिला। वह हीरा महाराज को किसी संत ने दिया था और कहाँ था

कि जब तक यह हीरा तुम्हारे पास रहेगा तब तक तुम्हारे राज्य में सुख-शन्ति रहेगी। मगर आज हीरा खो गया तो महाराज के मस्तिष्क में तरह-तरह के शंकाऐ उभरने लगी। दोपहर तक जब हीरा न मिला तो उन्होने बेचैन होकर घोषणा कर दी कि जो भी उस हीरे को ढुढ़कर लाएगा उसे मुँह मागा पुरस्कार दिया जायेगा। संयोग से हीरा महल के जमादार को मिल गया।

महाराज को तब कही जाकर सांस में सांस आई। उन्होने जमादार से कहा मांगो क्या मागते हो हम तुम्हे मुँह मांगा इनाम देंगे। जमादार सोचने लगा कि क्या मांगे। उसकी कुछ भी समझ में नही आया तो वह बोला-’’अन्नदाता! मुझे कल तक कि मोहलत दें मै सोच लूं’’ महाराज ने उसकी बात मान ली। उसी दिन राजगुरु के दिमाग में खुराफात आई।

उसने तुरन्त सेनापती को अपने विचार बताए कि तेनाली राम की एक जमादार द्वारा बंइज्जती कराने का अच्छा अवसर हैं। उसकी योजना जानकर सेनापती प्रसन्न हो उठे। उसने तुरन्त जामादार को बुलाया। और पूछा-’’कल तुम महाराज से क्या मागोगे?’’

’’समझ में नही आ रहा सेनापती जी कि क्या मांगू’’
सेनापती ने तुरन्त स्वर्ण मुद्राओ से भरी एक थैली उसकी ओर बड़ा दी-ये लो उसमें चार हजार स्वर्ण मुद्राए हैं। तुम्हे महाराज से वही मांगना हैं जो हम कहें। सेनापती ने उसे अपनी बात बताई। सुनकर जमादार ड़र गया। अगर हमारी बात न मानोगे तो जान से हाथ धो बैठोगे।

भयभीत होकर जमादार ने हामी भर दी। दुसरे दिन महाराज ने उसे बुलाकर पूछ़ा-’’बोलो क्या मागते हो?’’
’’महाराज ! हाथ जोड़कर वह ड़रते-ड़रते बोेला-’’मैं तेनाली राम जी की पीठ पर बैठकर बाजा़र घूमना चाहता हूँ।

’’क्या बकते हो’’महाराज -होश में तो हो?’’
मैं यही चाहता हूँ महाराज। महाराज क्या करते। वे वचन में बधे हुए थे। मजबूरी थी, अतः मन मसोसकर उन्होने तेनाली राम की ओर देखा। उनकी उलझन भांपकर तेनाली राम बोला-आप बिल्कुल भी चिन्ता न करे महाराज। मैं इसकी इच्छा पूर्ण करता हूँ। जमादार सहमा सा खड़ा था। उसे अपनी मौत साफ दिखाई दे रही थी।

तेनाली राम पुरे दरबार को संम्बोधित करके बोला-बंधुओ, महाराज की अंगूठी का हीरा ढुढ़ने के बदले में जमादार ने मेरी पीठ पर बैठकार बाजा़र घुमने की इच्छा व्यक्त की हैं। मैं महाराज की वचन का लाज रखने के लिए इसे अपनी पीठ पर बैठाकर बाजा़र घुमाने ले जाऊंगा। फिर जमादार ने मुखातिब हुए-आओ बैठो मेरी पीठ पर। सुनते ही जमादार आगे बड़ा और तेनाली राम के गले में बांहे ड़ालकर उसकी पीठ पर सवार होने लगा।

’’ठहरो -ये क्या हैं।’’तेनाली राम ने उसे ड़पकते हुए कहा-’’तुमने मेरी पीठ पर बैठकर सैर करने की बात कही थी। गले में हाथ ड़ालने की नही। पीठ पर बैठो, बिना कुछ पकड़े।’’
क्षणभर में ही दरबार का माहौल बदल गया। मंत्री और सेनापती के दमकते चेहरे बुझ गए। जमादार अचकचा कर कभी महाराज की ओर देखता, कभी सेनापती की ओर देखता। सोच क्या रहे हो पीठ पर बैठते क्यो नही अचानक तेनाली राम ने कड़ककर पूछा। ’’बिना सहारे के पीठ पर कैसे बैठ सकता हूँ। जमादार रुओसा सा हो उठे।

’’कैसे बैठा जा सकता हैं यह बात भी उससे पूछो जिसके कहने पर तुमने मेरी पीठ पर बैठकर सैर करने की बात कही थी। तेनाली राम गुर्राया।
जमादार की नजर फौरन सेनापती की कुर्सी की उठी, नगर वह वहाँ नही था। जमादार ड़र के मारे रोने लगा, फिर उसने महाराज के पाँव पकड़ लिए-’’मुझे क्षमा कर दे महाराज-मुझे जान सेे मारने की धमकी दी गई थी’’ कहते हुए महाराज को पुरी बात बता दी।

महाराज सेनापती की करतूत सुनकर आग बबूला हो उठ-’’मंत्री जी! हम पाँच दिनो के लिए सेनापती को दरबार से मुअत्तल करते हैं। छठे दिन उन्हे दरबार में आकर पहले तेनाली राम से मांफी मागनी होगी, तभी वो अपना आसन ग्रहण कर सकते हैं।’’ कहकर महाराज सिहासन से उठ खड़े हुए, जिसका अर्थ था कि दरबार की कार्यवाही समाप्त हुई।

भगवान का संदेश (rochak kahaniya)

महाराज के मन में एक भव्य शिवालय बनवाने की इच्छा जगी हैं। उन्होने मंत्री को बुलाकर अपनी राय से अवगत कराया और शिवालय के लिए कोई उपयुक्त स्थान खोजने की आज्ञा दि। इसके लिए मंत्री ने नगर के बाहर एक भूखण्ड़ को चुना। महाराज की आज्ञा से तुरंत ही उस स्थान की सफाई आदि का कार्य प्रारम्भ हो गया।

उस स्थान की जुताई के दौरान वहाँ एक पुराने शिवालय के खण्ड़हर मिले, गहरी खुदाई करने पर वहाँ से भगवान शंकर की सोने की एक मूर्ति मिली। सोने की इस मूर्ति को देखकर मंत्री के मन में लालच आ गया और उसने उसे उठवाकर चुपचाप अपने घर पहुँचवा दिया। खुदाई करने वाले मजदूरो में तेनाली राम के आदमी भी थे। उन्होने इस बात की जानकारी तुरन्त तेनाली राम को दे दी।

यह सुनकर भी तेनाली राम चुप रहा और किसी उचित अवसर का इन्तजार करने लगा। उधर भूमि पूजन के बाद शिवालय का निर्माण शुरु हो गया। एक दिन दरबार लगा हुआ था, तभी महाराज ने दरबारियो से पुछा कि भगवान की कैसी मूर्ति बनवाई जाए। दरबारी अपनी-अपनी राय देने लगे किसी ने कहाँ,भगवान नंदी पर बैठे हो, तो किसी ने कहा अर्थ रुप में हो।

महाराज कुछ तय नही कर पाए और बात दुसरे दिन के लिए टल गई। दुसरे दिन जब दरबार लगा तो एक जटाजुटधारी संन्यसी उपस्थित हुआ। महाराज ने सिंहासन से उठकर स्वागत किया। सम्मान सहित आसन दिया। फिर उनकी इच्छा और आगमन हेतु पूछा।

तब संन्यासी बोला-’’राजन! मैं भगवान शिव के आदेश पर आपकी चिन्ता का निवारण करने के लिए उपस्थित हुआ हूँ और आपके लिए उनका संदेश लाया हूँ।’’
’’हमारी चिन्ता? भगवान शिव का संदेश?’’महाराज बोले-’’जल्दी बताए ऋषिवर क्या संदेश भेजा हैं भगवान शिव ने?’’

’’राजन! मंन्दिर के लिए भगवान शिव ने स्वयं अपनी स्वर्ण निर्मित प्रतिमा भेज दी हैं और इस समय वह मंत्री जी के घर पर रखी हैं। उसे वहा से उठवाकर मंन्दिर में प्रतिष्ठित कर दो।’’

बोल बम! बोल बम!! कहकर साधु अपना चिमटा बजाता वहा से चला गया। महाराज ने मंत्री की ओर देखा, मंत्री तो पहले ही घबराया हुआ था कि उस साधु को प्रतिमा की बात कैसे पता चली?

मगर अब क्योकि उसकी पोल खुल चुकी थी, अतः उसने सब सच बात बता देने में ही अपनी भलाई समझी।तभी महाराज को कुछ ध्यान आया और उन्होने चारो तरफ नज़र दौड़ाई तेनाली राम वहाँ कही नही था।
’’तेनाली राम कहाँ हैं?’’

तभी तेनाली राम वहाँ आ गया । उसे देखकर सभी हस पड़े। एक सभासद बोले ?-’’महाराज! यही थे वे साधु बाबा। कपड़े जटां सब उतार आए मगर कंठी माला तो उतारना भुल गए।’’
’’अब मन्दिर निर्माण का कार्य तेनाली राम के देख-रेख में होगा।’’महाराज ने घोषणा की और मंत्री जी की सुरत देखने लायक थी।

रसगुल्ले की जड़ (adbhut story)

एक बार ईरान का व्यापारी विजय नगर की यात्रा पर आया। महाराज कृष्णदेव राय ने दिल खोलकर उसका स्वागत किया, फिर सम्मान सहित उसे राजमहल में ठहराया गया। कई सेवक उसके सेवा में तैनात कर दिये गये। रात्री भोजन के बाद एक दिन महाराज ने हुसैन के लिए चाँदी की तश्तरी भरकर रसगुल्ले भेजे। महाराज का विचार था कि व्यापारी को रसगुल्ले अच्छे लगेंगे और वह खाने के बाद उनकी मांग करेगा।

मगर जब सेवक वापस आया। रसगुल्ले से भरी तश्करी उसके हाथो मे थी। महाराज सहित सभी दरबारी उसकी सुरत देखने लगे।
सेवक ने बताया-’’अन्नदाता! व्यापारी ने केवल एक रसगुल्ला खाया हैं और यह कहकर बाकी रसगुल्ले भेज दिये हैं कि हमें रसगुल्ले की जड़ चाहिए।’’
’’रसगुल्ले की जड़-’’महाराज एकाएक गंभीर हो गए थे और बोले-’’कितने दुःख की बात होगी यदि हम हुसैन की इच्छा पुरी न कर पाए।

क्या आप लोगो में से कोई इस समस्या का समाधान कर सकता हैं।’’ दरबारी तो उसके मांग से ही परेशान थे। उन्हे स्वयं नही मालुम था कि आखिर रसगुल्ले का जड़ होता क्या हैं। हिम्मत करके राजगुरु बोला-’’महाराज! ईरान में ऐसा होता होगा, मगर ये हिन्दुस्तान हैं। हमें उसे साफ-साफ बता देना चाहिए कि रसगुल्ले की जड़ नही होती हैं।’’

कैसे नही होता- तेनाली रामा बोले’’होती हैं और हमारे हिन्दुस्तान में होती हैं। कितने अफ़सोस की बात हैं कि सबसे अधिक रसगुल्ले खाने वाले राजगुरु को रसगुल्ले का जड़ पता नही ।’’ राजगुरु तिलमीला कर रह गया। महाराज कृष्णदेव राय ने तेनाली राम के चेहरे पर नज़रे जमा के कहा-’’तेनाली! हम व्यापारी के सामने शर्मिंदा नही होना चाहते हैं। तुम कही से भी रसगुल्ले का जड़ लाकर उसको भेज दो।’’

दुसरे दिन तेनाली राम दारबार में आया तो उसके हाथ में चाँदी की एक तश्तरी थी जिस पर कपड़ा ढ़का था। दरबारी हैरान और उत्सुकता से उसे देखने लगे। ’’महाराज ! रसगुल्ले की जड़ हाजिर हैं, फौरन मेहमान की सेवा में भेजी जाए।’’ दरबारी हैरान थे कि तेनाली रामा ने ये क्या बला उठा लाया जिसे रसगुल्ले की जड़ कह रहा हैं।

उन्होने उसे देखने की इच्छा जाहिर की किन्तु तेनाली राम उसे देखने से स्पष्ट इंकार कर दिया बोला-पहले मेहमान, फिर बाद में कोई और।’’ महाराज स्वयं रसगुल्ले की जड़ देखना चाहते थे। अतः उन्होने एक मंत्री को आदेश दिया कि मेहमान को यही बुला लाएं। व्यापारी आ गया तो महाराज ने सेवक को इशारा किया। सेवक ने तेनाली राम के हाथ से तश्तरी लेकर मेहमान के सामने पेश की।
’’यह क्या है महाराज! व्यापारी ने पुछा।

’’रसगुल्लो की जड़।’’
’’वाह-वाह’’चहक कर व्यापारी ने तश्तरी पर से कपड़ा हटाया और उसमें रखी वस्तु को चखते हुए बोला-हिन्दुस्तान में यही वह चीज हैं जो ईरान में नही मिलती।’’ दरबारी फटी-फटी आँखो से उस वस्तु को देख रहे थे। तश्तरी में छिले हुए गन्ने के छोटे-छोट अर्थांत् गंड़ेरियाँ थी।

और उस दिन सम्राट तेनाली राम से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होने अपने गले की बेश्किमती माला उतार कर उसके गले में ड़ाल दिया। व्यापारी ने भी खुश होकर उन्हे एक ईरानी कालीन भेंट दिया।

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