3 knowledgeabe stories in hindi

क्या आपको कहानी पढ़ना पसंद है, क्या आप अपने बचपन की यादों को फिर से एक बार ताजा करना चाहते हैं? तो यह पोस्ट सिर्फ और सिर्फ आपके लिए ही है।
इस पोस्ट में हमने बचपन से जुडी कुछ ऐसी कहानियां बताई है जो आप अपने बचपन में सुना करते थे और जिन्हें सुनकर हमारे मन में एक नए उत्साह का संचार होता था। तो चलिए बिना वक्त बर्बाद किए अपने बचपन की यादों को ताजा करते हैं।

1.सबसे बड़ी कमी (hindi kahani)

महाराज कृष्णदेव राय विजय नगर को सुंन्दरता और स्वच्छता में बेजोड़ देखना चाहते थे। अतः उन्होने प्रधानमंत्री को बुलाकर अपनी इच्छा से अवगत कराया तथा आवश्यक निर्देश भी दिये।

’’मंत्री जी! हमारे सपनो का विजय इतना सुन्दर होना चाहिए कि इसे देखकर स्वर्ग के देवता भी ईर्ष्या करे,इस कार्य के लिए जीतना चाहे धन खर्च करो।’’
’’आदेश मिलते ही विजय नगर का कायाकल्प होने लगा। कुछ ही समय में विजय नगर की चर्चा आर्यवर्त के सुन्दर राज्यो में होने लगी।

दूर-दूर के लोग विजय नगर की सुन्दरता देखने आने लगे। जो भी वहाँ आता महाराज कृष्णदेव राय और विजय नगर की सुन्दरता की चर्चा करता। महाराज बहुत खुश थे।

एक दिन दरबार लगा हुआ था। सभी अपने-अपने स्थान पर बैठे हुए थे। और मंत्रियो की प्रशंसा करते हुए की कह रहे थे। हमारी व प्रधानमंत्री की दिन-रात की मेहनत से विजय नगर की खुबसूरती में चार चाँद लग गये हैं।

फिर भी आपके दृष्टि में कोई कमी हो तो बताईये ताकि उस कमी को दूर किया जाए।’’ सभी ने एक स्वर में कहाँ कि विजय नगर जैसा सुन्दर राज्य तो पृथ्वी पर दुसरा नही हैं। हमें तो इसकी सुन्दराता में कोई कमी दिखाई नही देती। दरबार में सभी महाराज और प्रधानमंत्री की प्रशंसा कर रहे थे।

तभी राजगुरु की दृष्टि तेनाली राम पर पड़ी जिसने मुँह पर हाथ रखकर दरबार की कार्यवाही को देख रहा था। राजगुरु ने महाराज से कहा-महाराज! तेनाली राम को शायद विजय नगर की प्रशासा पसन्द नही आई। देखिये तो किस प्रकार चुप चाप बैठे हैं। लगता हैं आपके खुशी में इन्हे कोई खुशी नही है।’’

महाराज ने तेनाली राम की ओर देखा फिर पुछा-’’क्यो तेनाली राम! इस प्रकार गुमसुम क्यो बैठे हो? आज चारो ओर विजय नगर की प्रशंसा हो रही हैं क्या तुम्हे इस बात की कोई खुशी नही हैं।’


तेनाली राम बोला-’’खुशी तो बहुत हैं महाराज!’’मगर,मगर क्या? जवाब दो तेनाली राम-अवश्य ही ऐसी कोई बात हैं जो तुम्हे अच्छी नही लगी हैं।’’

वह बोला एक कमी रह गई हैं महाराज !’’ कैसी कमी? सुनकर महाराज तिलमीला से गए सच-सच कहो तेनाली राम। यदि तुमने यह कमी नही बताई तो तुम्हे मृत्युदण्ड़ मिलेगा।’’ मुझे मंजुर हैं महाराज किन्तु उस कमी को देखने के लिए आपको मेरे साथ नगर भ्रमण के लिए चलना होगा। ठीक हैं चलो।

तेनाली राम, महाराज व अन्य दरबारीयो को लेकर कमी दिखाने चल पड़ा। सभी अधिकारी , महामंत्री और स्वयं महाराज भी चकित थे कि ऐसी कौन सी कमी हैं जो विजय नगर में रह गई जो तेनाली राम को मृत्यु दण्ड़ का भी भय नही हैं।

महाराज का कांरवा महल से बाहर निकला और सुनसान सड़क पर चल पड़ा। पहले ऐसा होता था कि जैसे ही महाराज की सवारी महल से बाहर निकलती थी। तो सड़क के दोनो ओर एकत्रित प्रजा महाराज के दर्शन पर उनकी जय-जयकार करती।

लोग महाराज पर फूलो की वर्षा करते थे और महाराज के दर्शन पर हर्षित होते मगर उस बार कुछ भी ऐसा नही था। आज न वहाँ प्रजा थी न जय-जयकार का उद्घोष और न फूलो की वर्षा न किसी प्रकार का उत्साह। चारो ओर था तो बस एक अजीब सा संन्नाटा।

निशब्द सवारी आगे बढ़ती जा रही थी। मानो कोई मातमी जुलुस चला जा रहा हैं। ये सन्नाटा महाराज को बड़ा अजीब लगा। अपनी प्रजा को वहाँ न देखकर उनका मन बेचैन हो गया।

व्याकुल होकर उन्होने तेनाली राम की ओर देखा। ’’महाराज नगर की सुन्दरता के चक्कर में आप प्रजा से दूर हो गए हैं। और प्रजा आपसे दूर चली गई। क्या इससे बड़ी भी कमी हो सकती हैं?’’

अब महाराज ने मंत्री की ओर देखा तब मंत्री ने जल्दी से मामले को स्पष्ट किया और बोला-’’महाराज! फूल यदि बरसाकर प्रजा विजय नगर की सड़के गंदी ना करे व्यर्थ का ध्वनीप्रदुषण ना फैले इसलिए इन सब कार्यो पर रोक लगा दी गई हैं।’’ इसी बिच महाराज का रथ नगर से दूर एक बस्ती से कारीब आ पहुचा।

वहाँ आकर महाराज को पता लगा कि प्रजा पर नए-नए कर लगाकर उसकी कमर तोड दी गई हैं। सुन्दरता के चक्कर में छोटी बस्तीयो की ओर ध्यान नही दिया जा रहा था। बस्तियो में गंदगी के कारण बीमारीयाँ फैल रही थी।

प्रजा के इस कष्ट को देखकर महाराज का दिल दुःखी हुआ। वे समझ गए कि क्या कमी हैं पहले वाले विजय नगर की अपेक्षा आज के विजय नगर में।

उन्होने फौरन आज्ञा दी-’’सारे काम बंद करा दिये जाएं। बड़े व नएं कर वापस ले लिए जाएं। प्रजा का जीवन ही सुन्दर नही बना तो विजय नगर की सुन्दरता का क्या महत्व?

हमे प्रजा और अपने बिच यह दुरी स्वीकार नही। सचमुच तेनाली राम ने हमारा ध्यान एक कमी की ओर आकृष्ट किया। तेनाली राम हम तुम्हारे आभारी हैं।’’

2.मुँह देखकर (hindi story)

कई बार महाराज कृष्णदेव राय अपने दरबारियो का अजीबो-गरीब इम्तिहान लिया करते थे। एक दिन उन्होने भरे दरबार में सभी दरबारियों को सौ-सौ अशर्फियां से भरी थैली दी और कहाँ-’’सप्ताह भर के अन्दर-अन्दर आपको यह धन अपने उपर खर्च करना हैं, किन्तु शर्त यह हैं कि प्रत्येक अशर्फी हमारा मुँह देखकर खर्च करे। जो ऐसा नही करेगा, उसे दण्ड़ित किया जायेगा।

सभी दरबारीयो ने हंसी-खुशी थैलियाँ ले लीं। और अपने घरो को चल दिये। दुसरे दिन जब वो बाजार पहुचे तो परेशान हो उठे। उसी परेशानी में सप्ताह गुजर गया। राजाज्ञा का उलघंन नही किया जा सकता था।

यदि महाराज ने पूछ लिया कि खर्च करने के पहले मेरा मुँह किस प्रकार देखे तो क्या जवाब देंगे? अब तो दण्ड़ित होना पड़ेगा। एक सप्ताह बाद दरबार लगा तो सबसे पहले महाराज ने दरबारियो से यही पूछा-’’कहिए, आप लोगो ने क्या-क्या खरीदा,’’

’ख़रीददारी कैसे कर सकते थे महाराज अपकी आज्ञा ही ऐसी थी। बाजा़र में आपका मुँह कैसे और कहाँ देखते, इस प्रकार न आपका दर्शन हुए और न ही अशर्फिया खर्च हए।

सभी की ओर से राजा पुरोहीत ने उत्तर दिया। अब महाराज ने तेनाली राम की ओर देखा-’’और तेनाली राम तुम, क्या तुम भी अशर्फियाँ खर्च नही कर सके?

’महाराज! मैने सारी अशर्फियाँ खर्च कर दी। ये नई धोती, ये कुर्ता, ये नया दुपट्टा, सब उन्ही अशर्फियो से खरीदे हैं।

इसका मतलब तुमने हमारी आज्ञा का उलघंन किया हैं। महाराज ने आँखे तरेरी।
’’हरगिज नही महाराज-’’बड़े ही सीधे और नरम लहजे में तेनाली राम ने कहा-’’एक-एक अशर्फी आपका श्रीमुख देखकर खर्च किये हैं।’’

’’किन्तु कैसे’’ यह क्या मुश्किल था महाराज। प्रत्येक अशर्फी पर आपका चित्र अंकित हैं। मैने आपका मुख देखा और खर्च कर किए।

’’ओह!’’ महाराज मुस्कुरा उठे। सभी दरबार हक्के-बक्के से होकर तेनाली राम का चेहरा देख रहे थे। और सोच रहे थे कि आखिर यह खाता क्या हैं जो इसका दिमाग इतना तेज हैं।

3.सबसे किमती वस्तु (story in hindi)

एक युद्ध में विजय प्राप्त करने के उपरान्त महाराज के मन में आया कि एक विजय स्तम्भ की स्थापना कराई जाये। फौरन एक शिल्पी को यह कार्य सौपा गया। जब विजय स्तम्भ बनकर पुरा हुआ तो उनकी शोभा देखते ही बनती थी।

शिल्प कला की वह अनूठी मिसाल थी। महाराज ने शिल्पी को दरबार में बुलाकर पारिश्रमिक देकर कहा-’’इसके अतिरिक्त तुम्हारी कला से प्रसन्न होकर हम तुम्हे और भी कुछ देना चाहते हैं। जो चाहो सो मांग लो।’’

’’अन्नदाता! सिर झुकाकर शिल्पी बोला-’’आपने मेरी कला की इतनी प्रशंसा की हैं कि अब मागंने को कुछ भी शेष नही हैं। बस आपकी कृपा बनी रहे, मेरी भी अभिलाषा हैं।

नही-नही कुछ तो मागंना ही होगा। महाराज ने हठ पकड़ ली। दरबारी शिल्पी को समझाकर बोल-’’ अरे भई! जब महाराज अपनी खुशी से तुम्हे पुरस्कार देना चाहते हैं तो इन्कार क्यों करते हों।

जो जी चाहे मांग लो, ऐसे मौके बार-बार नही मिलते हैं। शिल्पीकार बड़ा ही स्वाभिमानी था। पारिश्रमिक के अतिरिक्त और कुछ भी नही लेना चाहता था। यह उसके स्वभव के विपरित था किन्तु सम्राट भी जिद पर अड़े थे।

जब शिल्पीकार ने देखा कि महाराज मान ही नही हैं तो उसने अपने औजारो का थैला खाली करके महाराज की ओर बढ़ा दिया और बोला-’’महाराज!

यदि कुछ देना चाहते हैं तो मेरा यह थैला संसार की सबसे मुल्यवान वस्तु से भर दें। महाराज सोचने लगे क्या दें इसे कौन सी चीज दुनिया में सबसे अनमोल हैं।

अचानक उन्होने पूछा क्या तुम्हारे थैले को हीरे-जवाहरातों से भर दिया जाए। हीरे-जवाहरातों से बहुमुल्य भी कोई वस्तु हो सकती हैं। महाराज ने दरबारीयो की ओर देखा दरबारी स्वयं उलझन में थे।

कि हीरे-जवाहरात से भी कीमती क्या वस्तु हो सकती हैं। अचानक महाराज को तेनाली राम की याद आई जो आज दरबार में उपस्थित नही था।

उन्होने तुरन्त एक सेवक को तेनाली राम को बुलाने भेजा। कुछ देर बाद ही तेनाली राम दरबार में हाजिर हुआ था। रास्ते में उसने सेवक से सारी बात मालुम कर ली थी कि क्या बात हैं और महाराज ने क्यो बुलाया हैं।

तेनाली राम के आते ही महाराज ने उसे पुरी बात बताकर पुछा-अब बताओ संसार में सबसे मुल्यवान वस्तु कौन सी हैं। जो इस कलाकार को दी जाए।

’’मिल जायेगी झोला मेरे पास लाओ’’तेनाली राम ने शिल्पी के हाथ से झोला लेकर उसका मुँह खोला और तीन-चार बार उसे उपर नीचे किया। फिर उसका मुँह बाधंकर शिल्पीकार को देकर बोला-’’लो मैने इसमें संसार की सबसे मुल्यवान वस्तु भर दी हैं।’’

शिल्पीकार प्रसन्न हो उठा। उसने झोला उठाकर महाराज को प्रणाम किया और दरबार से चला गया। महाराज सहित सभी दरबारी हक्के-बक्के से देख रहे थे कि तेनाली राम ने उसे ऐसी क्या चीज दे दी की वह इस कदर खुश होकर चला गया।

उसके जाते ही महाराज ने पुछा-’’तुमने तो झोले मे कुछ वस्तु तो भरा ही नही था, फिर भी शिल्पकार चला कैसे गया।

’’महाराज! आपने देखा नही मैने उसके झोले में हवा भरी हैं। हवा संसार की सबसे मूल्यवान वस्तु हैं। उसके बिना संसार में कुछ भी संम्भव नही हैं।

उसके बिना प्राणी जीवित नही रह सकता हैं। न आग जले न पानी बने किसी कलाकर के लिए तो हवा का महत्व और भी अधिक हैं। कलाकार की कला को हवा न दी जाए तो कला और कलाकार दोनो ही दम तोड़ दें’

महाराज ने तेनाली राम की पीठ थपथपाई और अपने गले की बहुमूुल्य माला उतारकर तेनाली राम के गले में ड़ाल दीं।

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